सूरह Ash-Shu'ara
1 ता, सीन, मीम।
2 ये स्पष्ट किताब की आयतें हैं।
3 शायद (ऐ रसूल!) आप अपने आपको हलाक करने वाले हैं, इसलिए कि वे ईमान नहीं लाते।[1]
4 यदि हम चाहें, तो उनपर आकाश से कोई निशानी उतार दें, फिर उसके सामने उनकी गर्दनें झुकी रह जाएँ।[2]
5 और जब भी 'रह़मान' (अति दयावान्) की ओर से उनके पास कोई नई नसीहत आती है, तो वे उससे मुँह फेरने वाले होते हैं।
6 अतः निःसंदेह उन्होंने झुठला दिया, तो शीघ्र ही उनके पास उस चीज़ की खबरें आ जाएँगी, जिसका वे उपहास उड़ाया करते थे।
7 और क्या उन्होंने धरती की ओर नहीं देखा कि हमने उसमें हर उत्तम प्रकार के कितने पौधे उगाए हैं?
8 निःसंदे इसमें निश्चय एक बड़ी निशानी[3] है। (परंतु) उनमें से अधिकतर ईमान लाने वाले नहीं थे।
9 तथा निःसंदेह आपका पालनहार, निश्चय वही सबपर प्रभुत्वशाली, अत्यंत दयावान् है।
10 और जब आपके पालनहार ने मूसा को पुकारा कि उन ज़ालिम लोगों[4] के पास जाओ।
11 फ़िरऔन की जाति के पास। क्या वे डरते नहीं?
12 उसने कहा : ऐ मेरे पालनहार! निःसंदेह मुझे डर है कि वे मुझे झुठला देंगे।
13 और मेरा सीना घुटता है और मेरी ज़बान नहीं चलती, अतः हारून की ओर संदेश भेज।
14 और उनका मुझपर एक अपराध का आरोप है। अतः मैं डरता हूँ कि वे मुझे मार डालेंगे।
15 (अल्लाह ने) फरमाया : ऐसा कभी नहीं होगा, अतः तुम दोनों हमारी निशानियों के साथ जाओ। निःसंदेह हम तुम्हारे साथ ख़ूब सुनने[5] वाले हैं।
16 तो तुम दोनों फ़िरऔन के पास जाओ और कहो कि निःसंदेह हम सारे संसारों के पालनहार के संदेशवाहक हैं।
17 कि तू बनी इसराईल को हमारे साथ भेज दे।
18 (फ़िरऔन ने) कहा : क्या हमने तुझे अपने यहाँ इस हाल में नहीं पाला कि तू बच्चा था और तू हमारे बीच अपनी आयु के कई वर्ष रहा?
19 और तूने अपना वह काम[6] किया, जो तूने किया। और तू अकृतज्ञों में से है।
20 (मूसा ने) कहा : मैंने उस समय वह काम इस हाल में किया कि मैं अनजानों में से था।
21 फिर मैं तुम्हारे पास से भाग गया, जब मैं तुमसे डरा, तो मेरे पालनहार ने मुझे हुक्म (नुबुव्वत एवं ज्ञान) प्रदान किया और मुझे रसूलों में से बना दिया।
22 और यह कोई उपकार है, जो तू मुझपर जता रहा है कि तूने बनी इसराईल काे ग़ुलाम बना रखा है।
23 फ़िरऔन ने कहा : और 'रब्बुल-आलमीन' (सारे संसारों का पालनहार) क्या है?
24 (मूसा ने) कहा : जो आकाशों और धरती का रब है और जो उनके बीच है उसका भी, यदि तुम विश्वास करने वाले हो।
25 उसने अपने आस-पास के लोगों से कहा : क्या तुम सुनते नहीं?
26 (मूसा ने) कहा : जो तुम्हारा पालनहार तथा तुम्हारे पहले बाप-दादा का पालनहार है।
27 (फ़िरऔन ने) कहा : निश्चय तुम्हारा यह रसूल, जो तुम्हारी ओर भेजा गया है, अवश्य पागल है।
28 (मूसा ने) कहा : जो पूर्व तथा पश्चिम रब है और उसका भी जो उन दोनों के बीच है, अगर तुम समझते हो।
29 (फ़िरऔन ने) कहा : निश्चय यदि तूने मेरे अलावा किसी और को पूज्य बनाया, तो मैं तुझे अवश्य ही बंदी बनाए हुए लोगों में शामिल कर दूँगा।
30 (मूसा ने) कहा : क्या भले ही मैं तेरे पास कोई स्पष्ट चीज़ ले आऊँ?
31 उसने कहा : तू उसे ले आ, यदि तू सच्चे लोगों में से है।
32 फिर उसने अपनी लाठी फेंक दी, तो अचानक वह एक प्रत्यक्ष अजगर बन गई।
33 तथा उसने अपना हाथ निकाला, तो एकाएक वह देखने वालों के लिए सफेद (चमकदार) था।
34 उसने अपने आस-पास के प्रमुखों से कहा : निश्चय यह तो एक बड़ा कुशल जादूगर है।
35 जो चाहता है कि अपने जादू के साथ तुम्हें तुम्हारी धरती से निकाल[7] दे। तो तुम क्या आदेश देते हो?
36 उन्होंने कहा : इसके तथा इसके भाई को मोहलत दें और नगरों में (लोगों को) जमा करने वालों को भेज दें।
37 कि वे तेरे पास हर बड़ा जादूगर ले आएँ, जो जादू में बहुत कुशल हो।
38 तो जादूगर एक निश्चित दिन के नियत समय पर इकट्ठा कर लिए गए।
39 तथा लोगों से कहा गया : क्या तुम एकत्र होने वाले[8] हो?
40 शायद हम इन जादूगरों के अनुयायी बन जाएँ, यदि वही विजयी हों।
41 फिर जब जादूगर आ गए, तो उन्होंने फ़िरऔन से कहा : क्या सचमुच हमें कुछ पुरस्कार मिलेगा, यदि हम ही प्रभावी रहे?
42 उसने कहा : हाँ! और निश्चय तुम उस समय निकटवर्तियों में से हो जाओगे ।
43 मूसा ने उनसे कहा : फेंको, जो कुछ तुम फेंकने वाले हो।
44 तो उन्होंने अपनी रस्सियाँ और लाठियाँ फेंकीं और कहा : फ़िरऔन के प्रभुत्व की सौगंध! निःसंदेह हम, निश्चय हम ही विजयी रहेंगे।
45 फिर मूसा ने अपनी लाठी फेंकी, तो एकाएक वह उन चीज़ों को निगल रही थी, जो वे झूठ बना रहे थे।
46 इसपर जादूगर सजदा करते हुए गिर गए।[9]
47 उन्होंने कहा : हम सारे संसारों के पालनहार पर ईमान ले आए।
48 मूसा तथा हारून के पालनहार पर।
49 (फ़िरऔन ने) कहा : तुम उसपर ईमान ले आए, इससे पहले कि मैं तुम्हें अनुमति दूँ? निःसंदेह यह अवश्य तुम्हारा बड़ा (गुरू) है, जिसने तुम्हें जादू सिखाया है। अतः निश्चय तुम जल्दी जान लोगे। मैं अवश्य तुम्हारे हाथ और तुम्हारे पाँव विपरीत दिशा[10] से काट दूँगा तथा निश्चय तुम सभी को अवश्य बुरी तरह सूली पर चढ़ा दूँगा।
50 उन्होंने कहा : कोई नुक़सान नहीं, निश्चित रूप से हम अपने पालनहार की ओर पलटने वाले हैं।
51 हम आशा रखते हैं कि हमारा पालनहार हमारे लिए, हमारे पापों को क्षमा कर देगा, इस कारण कि हम सबसे पहले ईमान लाने वाले हैं।
52 और हमने मूसा की ओर वह़्य की कि मेरे बंदों को लेकर रातों-रात निकल जा। निश्चय ही तुम्हारा पीछा किया जाएगा।
53 तो फ़िरऔन ने नगरों में (सेना) एकत्र करने वालों को भेज दिया।[11]
54 कि निःसंदेह ये लोग एक छोटा-सा समूह हैं।
55 और निःसंदेह ये हमें निश्चित रूप से गुस्सा दिलाने वाले हैं।
56 और निश्चय ही हम सब चौकन्ना रहने वाले हैं।
57 इस तरह हमने उन्हें बाग़ों और सोतों से निकाल दिया।
58 तथा ख़ज़ानों और उत्तम आवासों से।
59 ऐसा ही हुआ और हमने उनका वारिस बनी इसराईल को बना दिया।
60 तो उन्होंने सूर्योदय के समय उनका पीछा किया।
61 फिर जब दोनों गिरोहों ने एक-दूसरे को देखा, तो मूसा के साथियों ने कहा : निःसंदेह हम निश्चय ही पकड़े जाने[12] वाले हैं।
62 (मूसा ने) कहा : हरगिज़ नहीं! निश्चय मेरे साथ मेरा पालनहार है। वह अवश्य मेरा मार्गदर्शन करेगा।
63 तो हमने मूसा की ओर वह़्य की कि अपनी लाठी को सागर पर मारो। (उसने लाठी मारी) तो वह फट गया और हर टुकड़ा बड़े पहाड़ की[13] तरह हो गया।
64 तथा वहीं हम दूसरों को निकट ले आए।
65 और हमने मूसा को और जो उसके साथ थे, सबको बचा लिया।
66 फिर हमने दूसरों को डुबो दिया।
67 निःसंदेह इसमें निश्चय एक बड़ी निशानी है। और उनमें से अधिकतर लोग ईमान लाने वाले नहीं थे।
68 और निःसंदेह आपका पालनहार, निश्चय वही सबपर प्रभुत्वशाली, अत्यंत दयावान् हैl
69 तथा आप उन्हें इबराहीम का समाचार सुनाएँ।
70 जब उसने अपने बाप तथा अपनी जाति से कहा : तुम किसकी पूजा करते हो?
71 उन्होंने कहा : हम कुछ मूर्तियों की पूजा करते हैं, इसलिए उन्हीं की सेवा में लगे रहते हैं।
72 उसने कहा : क्या वे तुम्हें सुनते हैं, जब तुम (उन्हें) पुकारते हो?
73 या तुम्हें लाभ देते हैं, या हानि पहुँचाते हैं?
74 उन्होंने कहा : बल्कि हमने अपने बाप-दादा को पाया कि वे ऐसा ही करते थे।
75 उसने कहा : तो क्या तुमने देखा कि जिनको तुम पूजते रहे।
76 तुम तथा तुम्हारे पहले बाप-दादा?
77 सो निःसंदेह वे मेरे शत्रु हैं, सिवाय सारे संसारों के पालनहार के।
78 वह जिसने मुझे पैदा किया, फिर वही मेरा मार्गदर्शन करता है।
79 और वही जो मुझे खिलाता है और मुझे पिलाता है।
80 और जब मैं बीमार होता हूँ, तो वही मुझे अच्छा करता है।
81 तथा वह जो मुझे मारेगा, फिर[14] मुझे जीवित करेगा।
82 तथा वह, जिससे मैं आशा रखता हूँ कि वह बदले के दिन मेरे पाप क्षमा कर देगा।
83 ऐ मेरे पालनहार! मुझे हुक्म (धर्म का ज्ञान) प्रदान कर और मुझे नेक लोगों के साथ मिला।
84 और बाद में आने वालों में मुझे सच्ची ख्याति प्रदान कर।
85 और मुझे नेमतों वाली जन्नत के वारिसों में से बना दे।
86 तथा मेरे बाप को क्षमा कर दे।[15] निश्चय वह गुमराहों में से था।
87 तथा मुझे रुसवा न कर, जिस दिन लोग उठाए जाएँगे।[16]
88 जिस दिन न कोई धन लाभ देगा और न बेटे।
89 परंतु जो अल्लाह के पास पाक-साफ़ दिल लेकर आया।
90 और (अपने रब से) डरने वालों के लिए जन्नत निकट लाई जाएगी।
91 तथा पथभ्रष्ट लोगों के लिए भड़कती आग प्रकट कर दी जाएगी।
92 तथा उनसे कहा जाएगा : कहाँ हैं वे, जिन्हें तुम पूजते थे?
93 अल्लाह के सिवा। क्या वे तुम्हारी मदद करते हैं, या अपनी रक्षा करते हैं?
94 फिर वे और सब पथभ्रष्ट लोग उसमें औंधे मुँह फेंक दिए जाएँगे।
95 और इबलीस की समस्त सेनाएँ भी।
96 वे उसमें आपस में झगड़ते हुए कहेंगे :
97 अल्लाह की क़सम! निःसंदेह हम निश्चय खुली गुमराही में थे।
98 जब हम तुम्हें सारे संसारों के पालनहार के बराबर ठहराते थे।
99 और हमें तो सिर्फ़ इन अपराधियों ने गुमराह किया।
100 अब न हमारे लिए कोई सिफारिश करने वाले हैं।
101 और न कोई घनिष्ट मित्र।
102 तो यदि वास्तव में हमारे लिए वापस जाने का अवसर होता, तो हम ईमानवालों में से हो जाते।[17]
103 निःसंदेह इसमें निश्चय एक बड़ी निशानी है। और उनमें से अधिकतर ईमानवाले नहीं थे।
104 और निःसंदेह आपका पालनहार, निश्चय वही सबपर प्रभुत्वशाली,[18] अत्यंत दयावान् हैl
105 नूह़ की जाति ने रसूलों को झुठलाया।
106 जब उनसे उनके भाई नूह़ ने कहा : क्या तुम डरते नहीं?
107 निःसंदेह मैं तुम्हारे लिए एक अमानतदार रसूल हूँ।[19]
108 अतः तुम अल्लाह से डरो और मेरी बात मानो।
109 मैं इस (कार्य) पर तुमसे कोई पारिश्रमिक (बदला) नहीं माँगता। मेरा बदला तो केवल सारे संसारों के पालनहार पर है।
110 अतः तुम अल्लाह से डरो और मेरी बात मानो।
111 उन्होंने कहा : क्या हम तुझपर ईमान ले आएँ, जबकि तेरे पीछे चलने वाले अत्यंत नीच[20] लोग हैं?
112 (नूह़ ने) कहा : मूझे क्या मालूम कि वे क्या कर्म करते रहे हैं?
113 उनका ह़िसाब तो मेरे पालनहार ही के ज़िम्मे है, यदि तुम समझो।
114 और मैं ईमान वालों को धुतकारने वाला[21] नहीं हूँ।
115 मैं तो बस एक खुला डराने वाला हूँ
116 उन्होंने कहा : ऐ नूह़! यदि तू बाज़ नहीं आया, तो अवश्य संगसार किए गए लोगों में से हो जाएगा।
117 उसने कहा : ऐ मेरे पालनहार! निःसंदेह मेरी जाति ने मुझे झुठला दिया!
118 अतः तू मेरे और उनके बीच दो-टूक निर्णय कर दे, तथा मुझे और जो ईमानवाले मेरे साथ हैं, उन्हें बचा ले।
119 तो हमने उसे और उन लोगों को जो उसके साथ भरी हुई नाव में थे, बचा लिया।
120 फिर उसके बाद शेष लोगों को डुबो दिया।
121 निःसंदेह इसमें निश्चय एक बड़ी निशानी है। और उनमें से अधिकतर ईमानवाले नहीं थे।
122 और निःसंदेह आपका पालनहार, निश्चय वही सबपर प्रभुत्वशाली, अत्यंत दयावान् है।
123 आद ने रसूलों को झुठलाया।
124 जब उनसे उनके भाई हूद[22] ने कहा : क्या तुम डरते नहीं हो?
125 निःसंदेह मैं तुम्हारे लिए एक अमानतदार रसूल हूँ।
126 अतः तुम अल्लाह से डरो और मेरी बात मानो।
127 मैं इस (कार्य) पर तुमसे कोई पारिश्रमिक (बदला) नहीं माँगता, मेरा बदला तो केवल सारे संसारों के पालनहार पर है।
128 क्या तुम हर ऊँचे स्थान पर एक स्मारक बनाते हो? इस स्थिति में कि व्यर्थ कार्य करते हो।
129 तथा बड़े-बड़े भवन बनाते हो, शायद कि तुम सदा जीवित रहोगे।
130 और जब तुम पकड़ते हो, तो बड़ी निर्दयता से पकड़ते हो।
131 अतः अल्लाह से डरो और जो मैं कहता हूँ, उसे मानो।
132 तथा उससे डरो जिसने उन चीज़ों से तुम्हारी मदद की, जिन्हें तुम जानते हो।
133 उसने चौपायों और बेटों से तुम्हारी मदद की।
134 तथा बाग़ों और जल स्रोताें से।
135 निश्चय ही मैं तुमपर एक बड़े दिन की यातना से डरता हूँ।
136 उन्होंने कहा : हमारे लिए बराबर है कि तू नसीहत करे, या नसीहत करने वालों में से हो।
137 यह तो केवल पहले लोगों की आदत है।[23]
138 और हम निश्चित रूप से दंडित नहीं होंगे।
139 तो उन्होंने उसे झुठला दिया, तो हमने उन्हें विनष्ट कर दिया। निःसंदेह इसमें निश्चय एक बड़ी निशानी है। और उनमें से अधिकतर लोग ईमानवाले नहीं थे।
140 तथा निःसंदेह आपका पालनहार, निश्चय वही सबपर प्रभुत्वशाली, अत्यंत दयावान् है।
141 समूद ने रसूलों[24] को झुठलाया।
142 जब उनसे उनके भाई सालेह़ ने कहा : क्या तुम डरते नहीं हो?
143 निःसंदेह मैं तुम्हारे लिए एक अमानतदार रसूल हूँ।
144 अतः अल्लाह से डरो और जो मैं कहता हूँ, उसका पालन करो।
145 मैं इसपर तुमसे कोई पारिश्रमिक (बदला) नहीं माँगता। मेरा बदला तो केवल सारे संसारों के पालनहार पर है।
146 क्या तुम उन चीज़ों में जो यहाँ हैं, निश्चिंत छोड़ दिए जाओगे?
147 बाग़ों तथा स्रोतों में।
148 तथा खेतों और खजूर के पेड़ों में, जिनके फल मुलायम और पके हुए हैं।
149 तथा तुम पर्वतों को काटकर बड़ी निपुणता के साथ घर बनाते हो।
150 अतः अल्लाह से डरो और मेरा आज्ञापालन करो।
151 और हद से आगे बढ़ने वालों का हुक्म न मानो।
152 जो धरती में बिगाड़ पैदा करते हैं और सुधार नहीं करते।
153 उन्होंने कहा : निःसंदेह तू उन लोगों में से है जिनपर प्रबल जादू किया गया है।
154 तू तो बस हमारे ही जैसा एक मनुष्य है। अतः कोई निशानी ले आ, यदि तू सच्चों में से है।
155 उसने कहा : यह एक ऊँटनी[25] है। इसके लिए पानी पीने की एक बारी है और तुम्हारे लिए एक निश्चित दिन पानी पीने की बारी है।
156 तथा उसे किसी बुराई से हाथ न लगाना, अन्यथा तुम्हें एक बड़े दिन की यातना पकड़ लेगी।
157 तो उन्होंने उसकी कूँचें काट दीं, फिर पछताने वाले हो गए।
158 तो उन्हें यातना ने पकड़ लिया। निःसंदेह इसमें निश्चय एक बड़ी निशानी है। और उनमें से अधिकतर ईमानवाले नहीं थे।
159 और निःसंदेह आपका पालनहार, निश्चय वही सबपर प्रभुत्वशाली, अत्यंत दयावान् है।
160 लूत की जाति ने रसूलों को झुठलाया।
161 जब उनके भाई लूत ने उनसे कहा : क्या तुम डरते नहीं हो?
162 निःसंदेह मैं तुम्हारे लिए एक अमानतदार रसूल हूँ।
163 अतः तुम अल्लाह से डरो और मेरी बात मानो।
164 मैं इस (कार्य) पर तुमसे कोई पारिश्रमिक (बदला) नहीं माँगता, मेरा बदला तो केवल सारे संसारों के पालनहार पर है।
165 क्या सभी संसारों में से तुम पुरुषों के पास आते[26] हो।
166 तथा उन्हें छोड़ देते हो, जो तुम्हारे पालनहार ने तुम्हारे लिए तुम्हारी पत्नियाँ पैदा की हैं। बल्कि तुम हद से आगे बढ़ने वाले लोग हो।
167 उन्होंने कहा : ऐ लूत! निःसंदेह यदि तू नहीं रुका, तो निश्चित रूप से तू अवश्य निष्कासित लोगों में से हो जाएगा।
168 उसने कहा : निःसंदेह मैं तुम्हारे काम से सख़्त घृणा करने वालों में से हूँ।
169 ऐ मेरे पालनहार! मुझे तथा मेरे घर वालों को उससे बचा ले, जो ये करते हैं।
170 तो हमने उसे और उसके सभी घर वालों को बचा लिया।
171 सिवाय एक बुढ़िया[27] के, जो पीछे रहने वालों में से थी।
172 फिर हमने दूसरों को विनष्ट कर दिया।
173 और हमने उनपर ज़ोरदार बारिश[28] बरसाई। तो उन लोगों की बारिश बहुत बुरी थी, जिन्हें डराया गया था।
174 निःसंदेह इसमें निश्चय एक बड़ी निशानी है। और उनमें से अधिकतर ईमानवाले नहीं थे।
175 और निःसंदेह आपका पालनहार, निश्चय वही सबपर प्रभुत्वशाली, अत्यंत दयावान् है।
176 ऐका[29] वालों ने रसूलों को झुठलाया।
177 जब उनसे शुऐब ने कहा : क्या तुम डरते नहीं हो?
178 निःसंदेह मैं तुम्हारे लिए एक अमानतदार रसूल हूँ।
179 अतः तुम अल्लाह से डरो और मेरी बात मानो।
180 मैं इस (कार्य) पर तुमसे कोई पारिश्रमिक (बदला) नहीं माँगता, मेरा बदला तो केवल सारे संसारों के पालनहार पर है।
181 नाप पूरा दो और कम देने वालों में से न बनो।
182 और सीधे तराज़ू से तोलो।
183 और लाेगों को उनका सामान कम न दो। और धरती में उपद्रव फैलाते मत फिरो।
184 और उससे डरो, जिसने तुम्हें तथा पहले लोगों को पैदा किया है।
185 उन्होंने कहा : निःसंदेह तू तो उन लोगों में से है जिनपर ताक़तवर जादू किया गया है।
186 और तू तो बस हमारे ही जैसा एक मनुष्य[30] है और निःसंदेह हम तो तुझे झूठों में से समझते हैं।
187 तो हम पर आसमान से कुछ टुकड़े गिरा दे, यदि तू सच्चों में से है।
188 उसने कहा : मेरा पालनहार अधिक जानने वाला है जो कुछ तुम कर रहे हो।
189 चुनाँचे उन्होंने उसे झुठला दिया। तो उन्हें छाया[31] के दिन की यातना ने पकड़ लिया। निश्चय वह एक बड़े दिन की यातना थी।
190 निःसंदेह इसमें निश्चय एक बड़ी निशानी है। और उनमें से अधिकतर ईमानवाले नहीं थे।
191 और निःसंदेह आपका पालनहार, निश्चय वही सबपर प्रभुत्वशाली, अत्यंत दयावान् है।
192 तथा निःसंदेह, यह (क़ुरआन) निश्चय सारे संसारों के पालनहार का उतारा हुआ है।
193 इसे रूह़ुल-अमीन[32] (अत्यंत विश्वसनीय फ़रिश्ता) लेकर उतरा है।
194 आपके दिल पर, ताकि आप सावधान करने वालों में से हो जाएँ।
195 स्पष्ट अरबी भाषा में।
196 तथा निःसंदेह यह निश्चित रूप से पहले लोगों की पुस्तकों में मौजूद है।[33]
197 क्या उनके लिए यह एक निशानी न थी है कि इसे बनी इसराईल के विद्वान[34] जानते हैं।
198 और यदि हम इसे ग़ैर-अरब[35] लोगों में से किसी पर उतार देते।
199 फिर वह इसे उनके सामने पढ़ता, तो भी वे उसपर ईमान लाने वाले न होते।[36]
200 इसी प्रकार हमने इसे अपराधियों के हृदयों में प्रवेश कर दिया।
201 वे उसपर ईमान नहीं लाएँगे, यहाँ तक कि वे दर्दनाक यातना देख लें।
202 तो वह उनपर अचानक आ पड़े और वे सोचते भी न हों।
203 फिर वे कहें : क्या हम मोहलत दिए जाने वाले हैं
204 तो क्या वे हमारी यातना के लिए जल्दी मचा रहे हैं?
205 तो क्या आपने विचार किया यदि हम इन्हें कुछ वर्षों तक लाभ दें।
206 फिर उनपर वह (यातना) आ जाए, जिसका उनसे वादा किया जाता था।
207 तो उन्हें जो लाभ दिया जाता था, वह उनके किस काम आएगा?
208 और हमने किसी बस्ती को विनष्ट नहीं किया, परंतु उसके लिए कई सावधान करने वाले थे।
209 याद दिलाने के लिए। और हम अत्याचारी नहीं थे।
210 तथा इस (क़ुरआन) को लेकर शैतान नहीं उतरे।
211 और न यह उनके योग्य है, और न वे ऐसा कर सकते हैं।
212 निःसंदेह वे तो (इसके) सुनने ही से अलग[37] कर दिए गए हैं।
213 अतः आप अल्लाह के साथ किसी अन्य पूज्य को न पुकारें, अन्यथा आप दंड पाने वालों में हो जाएँगे।
214 और आप अपने निकटतम रिश्तेदारों को डराएँ।[38]
215 और ईमान वालों में से जो आपका अनुसरण करे, उसके लिए अपना बाज़ू[39] झुका दें।
216 फि यदि वे आपकी अवज्ञा करें, तो आप कह दें कि तुम जो कुछ कर रहे हो उसकी ज़िम्मेदारी से मैं बरी हूँ।
217 तथा उस सबपर प्रभुत्वशाली, अत्यंत दयावान् पर भरोसा करें।
218 जो आपको देखता है, जब आप खड़े होते हैं।
219 और सजदा करने वालों में आपके फिरने को भी।[40]
220 निःसंदेह वही सब कुछ सुनने वाला, सब कुछ जानने वाला है।
221 क्या मैं आपको बताऊँ कि शैतान किस पर उतरते हैं?
222 वे हर बड़े झूठे और बड़े पापी[41] पर उतरते हैं।
223 वे सुनी हुई बात को (काहिनों तक) पहुँचा देते हैं, और उनमें से अधिकतर झूठे हैं।
224 और कवि लोग, उनके पीछे भटके हुए लोग ही चलते हैं।
225 क्या आपने नहीं देखा कि वे प्रत्येक वादी में भटकते फिरते[42] हैं।
226 और यह कि निःसंदेह ऐसी बात कहते हैं, जो करते नहीं।
227 सिवाय उन (कवियों) के, जो[43] ईमान लाए, और अच्छे कर्म किए और अल्लाह को बहुत याद किया तथा बदला लिया, इसके बाद कि उनके ऊपर ज़ुल्म किया गया। तथा वे लोग, जिन्होंने अत्याचार किया, शीघ्र ही जान लेंगे कि वे किस जगह लौटकर जाएँगे।
टिप्पणियाँ
- 3 [1] अर्थात उनके ईमान न लाने के शोक में।
- 4 [2] परंतु ऐसा नहीं किया, क्योंकि दबाव का ईमान स्वीकार्य तथा मान्य नहीं होता।
- 8 [3] अर्थात अल्लाह के सामर्थ्य की।
- 10 [4] यह उस समय की बात है जब मूसा (अलैहिस्सलाम) दस वर्ष मदयन में रहकर मिस्र वापस आ रहे थे।
- 15 [5] अर्थात तुम दोनों की सहायता करते रहेंगे।
- 19 [6] यह क़िबती को क़त्ल करने की ओर संकेत है जो मूसा (अलैहिस्सलाम) से नबी बनाए जाने से पहले हो गया था। (देखिए : सूरतुल-क़स़स़)
- 35 [7] अर्थात यह उग्रवाद करके हमारे देश पर अधिकार कर ले।
- 39 [8] अर्थात लोगों को प्रेरणा दी जा रही है कि इस प्रतियोगिता में अवश्य उपस्थित हों।
- 46 [9] क्योंकि उन्हें विश्वास हो गया कि मूसा (अलैहिस्सलाम) जादूगर नहीं, बल्कि वह सत्य के उपदेशक हैं।
- 49 [10] अर्थात दाँया हाथ और बायाँ पैर या बायाँ हाथ और दायाँ पैर।
- 53 [11] जब मूसा (अलैहिस्सलाम) अल्लाह के आदेशानुसार अपने साथियों को लेकर निकल गए तो फ़िरऔन ने उनका पीछा करने के लिए नगरों में हरकारे भेजे।
- 61 [12] क्योंकि अब सामने सागर और पीछे फ़िरऔन की सेना थी।
- 63 [13] अर्थात बीच से मार्ग बन गया और दोनों ओर पानी पर्वत के समान खड़ा हो गया।
- 81 [14] अर्थात प्रलय के दिन अपने कर्मों का फल भोगने के लिए।
- 86 [15] (देखिए : सूरतुत-तौबा, आयत : 114)
- 87 [16] ह़दीस में वर्णित है कि प्रलय के दिन इबराहीम अलैहिस्सलाम अपने बाप से मिलेंगे। और कहेंगे : ऐ मेरे पालनहार! तूने मुझे वचन दिया था कि मुझे पुनः जीवित होने के दिन अपमानित नहीं करेगा। तो अल्लाह कहेगा : मैंने स्वर्ग को काफ़िरों के लिए अवैध कर दिया है। (सह़ीह़ बुख़ारी : 4769)
- 102 [17] इस आयत में संकेत है कि संसार में एक ही जीवन कर्म के लिए मिलता है। और दूसरा जीवन परलोक में कर्मों के फल के लिए मिलेगा।
- 104 [18] परंतु लोग स्वयं अत्याचार करके नरक के भागी बन रहे हैं।
- 107 [19] अल्लाह का संदेश बिना कमी और अधिकता के तुम्हें पहुँचा रहा हूँ।
- 111 [20] अर्थात धनी नहीं, निर्धन लोग कर रहे हैं।
- 114 [21] अर्थात मैं हीन वर्ग के लोगों को जो ईमान लाए हैं, अपने से दूर नहीं कर सकता जैसा कि तुम चाहते हो।
- 124 [22] आद जाति के नबी हूद (अलैहिस्सलाम) को उनका भाई कहा गया है; क्योंकि वह भी उन्हीं के समुदाय में से थे।
- 137 [23] अर्थात प्राचीन युग से होती चली आ रही है।
- 141 [24] यहाँ यह बात याद रखने की है कि एक रसूल का इनकार सभी रसूलों का इनकार है; क्योंकि सबका उपदेश एक ही था।
- 155 [25] अर्थता यह ऊँटनी चमत्कार है जो उनकी माँग पर पत्थर से निकली थी।
- 165 [26] इस कुकर्म का आरंभ संसार में लूत (अलैहिस्सलाम) की जाति से हुआ। और अब यह कुकर्म पूरे विश्व में विशेष रूप से यूरोपीय देशों में व्यापक है। और समलैंगिक विवाह को यूरोप के बहुत-से देशों में वैध मान लिया गया है। जिसके कारण कभी भी उन पर अल्लाह की यातना आ सकती है।
- 171 [27] इससे अभिप्रेत लूत (अलैहिस्सलाम) की काफ़िर पत्नी थी।
- 173 [28] अर्थात पत्थरों की बारिश। (देखिए : सूरत हूद, आयत : 82-83)
- 176 [29] ऐका का अर्थ झाड़ी है। यह मदयन का क्षेत्र है जिसमें शुऐब अलैहिस्सलाम को भेजा गया था।
- 186 [30] यहाँ यह बात विचारणीय है कि सभी विगत जातियों ने अपने रसूलों को उनके मानव होने के कारण नकार दिया। और जिसने स्वीकार भी किया, तो उसने कुछ युग बीतने के पश्चात् अतिशयोक्ति करके अपने रसूलों को प्रभु अथवा प्रभु का अंश बना कर उन्हीं को पूज्य बना लिया। तथा एकेश्वरवाद को कड़ा आघात पहुँचाकर मिश्रणवाद का द्वार खोल लिया और कुपथ हो गए। वर्तमान युग में भी इसी का प्रचलन है और इसका आधार अपने पूर्वजों की रीतियों को बनाया जाता है। इस्लाम इसी कुपथ का निवारण करके एकेश्वरवाद की स्थापना के लिए आया है और वास्तव में यही सत्धर्म है। ह़दीस में है कि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फरमाया : मूझे वैसे न बढ़ाओ जैसे ईसाइयों ने मरयम के पुत्र (ईसा) को बढ़ा दिया। निःसंदेह मैं उसका दास हूँ। अतः मुझे अल्लाह का दास और उसका रसूल कहो। (देखिए : सह़ीह़ बुख़ारी : 3445)
- 189 [31] अर्थात उनकी यातना के दिन उनपर बादल छा गया। फिर आग बरसने लगी और धरती कंपित हो गई। फिर एक कड़ी ध्वनि ने उनकी जानें ले लीं। (इब्ने कसीर)
- 193 [32] रूह़ुल-अमीन से अभिप्राय आदरणीय फ़रिश्ता जिबरीलल (अलैहिस्सलाम) हैं, जो मुह़म्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम पर अल्लाह की ओर से वह़्य लेकर उतरते थे, जिसके कारण आप रसूलों की और उनकी जातियों की दशा से अवगत हुए। अतः यह आपके सत्य रसूल होने का प्रत्यक्ष प्रमाण है।
- 196 [33] अर्थात सभी आकाशीय ग्रंथों में अंतिम नबी मुह़म्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के आगमन तथा आपपर पुस्तक क़ुरआन के अवतरित होने की भविष्वाणी की गई है। और सब नबियों ने इसकी शुभ-सूचना दी है।
- 197 [34] बनी इसराईल के विद्वान अब्दुल्लाह बिन सलाम आदि, जो नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम और क़ुरआन पर ईमान लाए, वे इसके सत्य होने का खुला प्रमाण हैं।
- 198 [35] अर्थात ऐसे व्यक्ति पर जो अरब देश और जाति के अतिरिक्त किसी अन्य जाति का हो।
- 199 [36] अर्थात अरबी भाषा में न होता, तो कहते कि यह हमारी समझ में नहीं आता। (देखिए : सूरत ह़ा, मीम, सजदा, आयत : 44)
- 212 [37] अर्थात इसके अवतरित होने के समय शैतान आकाश की ओर जाते हैं तो उल्का उन्हें भस्म कर देते हैं।
- 214 [38] आदरणीय इब्ने अब्बास (रज़ियल्लाहु अन्हुमा) कहते हैं कि जब यह आयत उतरी तो आप (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) सफ़ा पर्वत पर चढ़े। और क़ुरैश के परिवारों को पुकरा। और जब सब एकत्र हो गए, और जो स्वयं नहीं आ सका तो उसने किसी प्रतिनिधि को भेज दिया। और अबू लहब तथा क़ुरैश आ गए तो आपने फरमाया : यदि मैं तुमसे कहूँ कि उस वादी में एक सेना है जो तुम पर आक्रमण करने वाली है, तो क्या तुम मुझे सच्चा मानोगे? सबने कहा : हाँ। हमने आपको सदा ही सच्चा पाया है। आपने कहा : मैं तुम्हें आगामी कड़ी यातना से सावधान कर रहा हूँ। इसपर अबू लहब ने कहा : तेरा पूरे दिन नाश हो! क्या हमें इसी के लिए एकत्र किया है? और इसीपर सूरत लह्ब उतरी। (सह़ीह़ बुख़ारी : 4770)
- 215 [39] अर्थात उसके साथ विनम्रता का व्यवहार करें।
- 219 [40] अर्थात प्रत्येक समय, अकेले हों या लोगों के बीच हों।
- 222 [41] ह़दीस में है कि फ़रिश्ते बादल में उतरते हैं, और आकाश में होने वाले निर्णय की बात करते हैं, जिसे शैतान चोरी से सुन लेते हैं। और ज्योतिषियों को पहुँचा देते हैं। फिर वह उसमें सौ झूठ मिलाते हैं। (सह़ीह़ बुख़ारी : 3210)
- 225 [42] अर्थात कल्पना की उड़ान में रहते हैं।
- 227 [43] इनसे अभिप्रेत ह़स्सान बिन साबित आदि कवि हैं, जो क़ुरैश के कवियों की भर्त्सना किया करते थे। (देखिए : सह़ीह़ बुख़ारी : 4124)