सूरह As-Saffat
1 क़सम है पंक्तिबद्ध (फ़रिश्तों) की!
2 फिर झिड़क कर डाँटने वालों की!
3 फिर (अल्लाह के) ज़िक्र (वाणी) की तिलावत करने वालों की।[1]
4 निःसंदेह तुम्हारा पूज्य निश्चय एक ही है।
5 जो आकाशों और धरती का तथा उन दोनों के बीच की समस्त चीज़ों का स्वामी है और सूर्य के उदय होने के सभी स्थानों का मालिक है।
6 निःसंदेह हमने संसार के आकाश को एक सुंदर शृंगार के साथ सुशोभित किया है, जो सितारे हैं।
7 और प्रत्येक सरकश शैतान से सुरक्षित करने के लिए।
8 वे सर्वोच्च सभा (मला-ए-आ'ला) के फ़रिश्तों की बात नहीं सुन सकते, तथा वे हर ओर से (उल्काओं से) मारे जाते हैं।
9 भगाने के लिए। तथा उनके लिए स्थायी यातना है।
10 परंतु जो कोई (शैतान फरिश्तों की किसी बात को) अचानक उचक ले जाए, तो एक दहकता हुआ अंगारा (उल्का)[2] उसका पीछा करता है।
11 तो आप इन (काफ़िरों) से पूछें कि क्या इन्हें पैदा करना अधिक कठिन है या उनका जिन्हें[3] हम पैदा कर चुके? निःसंदेह हमने उन्हें[4] एक लेसदार मिट्टी से पैदा किया है।
12 बल्कि आपने आश्चर्य किया और वे उपहास करते हैं।
13 और जब उन्हें नसीहत की जाए, तो वे क़बूल नहीं करते।
14 और जब वे कोई निशानी देखते हैं, तो खूब उपहास करते हैं।
15 तथा कहते हैं कि यह तो मात्र खुला जादू है।
16 क्या जब हम मर गए और मिट्टी तथा हड्डियाँ हो चुके, तो क्या सचमुच हम अवश्य उठाए जाने वाले हैं?
17 और क्या हमारे पहले बाप-दादा भी (उठाए जाएँगे)?
18 आप कह दीजिए : हाँ! तथा तुम अपमानित (भी) होगे!
19 वह बस एक ही झिड़की होगी, तो एकाएक वे देख रहे होंगे।
20 तथा वे कहेंगे : हाय हमारा विनाश! यह तो बदले का दिन है।
21 यही निर्णय का दिन है, जिसे तुम झुठलाया करते थे।
22 (आदेश होगा कि) इकट्ठा करो उन लोगों को जिन्होंने अत्याचार किया तथा उनके साथियों को और जिनकी वे उपासना किया करते थे ।
23 अल्लाह के सिवा। फिर उन्हें जहन्नम की राह दिखा दो।
24 और उन्हें ठहराओ[5], निःसंदेह वे प्रश्न किए जाने वाले हैं।
25 तुम्हें क्या हुआ कि तुम एक-दूसरे की सहायता नहीं करते?
26 बल्कि, आज वे सर्वथा आज्ञाकारी हैं।
27 और वे एक-दूसरे की ओर रुख़ करके परस्पर प्रश्न करेंगे।[6]
28 वे कहेंगे : निःसंदेह तुम हमारे पास दाहिने[7] से आया करते थे।
29 वे[8] कहेंगे : बल्कि तुम (स्वयं) ईमान वाले न थे।
30 तथा हमारा तुमपर कोई ज़ोर[9] न था, बल्कि तुम (स्वंय) हद से बढ़ने वाले लोग थे।
31 तो हमपर हमारे पालनहार का कथन सिद्ध हो गया। निःसंदेह हम निश्चय (यातना) चखने वाले हैं।
32 तो हमने तुम्हें गुमराह किया। निःसंदेह हम स्वयं गुमराह थे।
33 तो निश्चय ही वे उस दिन यातना में सहभागी होंगे।
34 निःसंदेह हम अपराधियों के साथ ऐसा ही किया करते हैं।
35 निःसंदेह वे ऐसे लोग थे कि जब उनसे कहा जाता कि अल्लाह के सिवा कोई पूज्य (इबादत के योग्य) नहीं, तो वे अभिमान करते थे।
36 तथा कहते थे : क्या सचमुच हम अपने पूज्यों को एक दीवाने कवि के कारण छोड़ देने वाले हैं?
37 बल्कि वह सत्य लेकर आए हैं तथा उन्होंने सभी रसूलों की पुष्टि की है।
38 निःसंदेह तुम निश्चय दुःखदायी यातना चखने वाले हो।
39 तथा तुम्हें केवल उसी का बदला दिया जाएगा, जो तुम किया करते थे।
40 परंतु अल्लाह के ख़ालिस (विशुद्ध) किए हुए बंदे।
41 यही लोग हैं, जिनके लिए निर्धारित रोज़ी है।
42 प्रत्येक प्रकार के फल। तथा वे सम्मानित किए गए हैं।
43 नेमत के बाग़ों में।
44 तख़्तों पर आमने-सामने बैठे होंगे।
45 उनपर प्रवाहित शराब के प्याले फिराए जाएँगे।
46 जो सफ़ेद होगी, पीने वालों के लिए स्वादिष्ट होगी।
47 न उसमें कोई सिरदर्द होगा, और न वे उससे मदहोश होंगे।
48 तथा उनके पास दृष्टि नीची रखने वाली, बड़ी आँखों वाली स्त्रियाँ होंगी।
49 मानो वे छिपाकर रखे हुए अंडे हों।[10]
50 फिर वे एक-दूसरे के सम्मुख होकर आपस में प्रश्न करेंगे।
51 उनमें से एक कहने वाला कहेगा : मेरा एक साथी था।
52 वह कहा करता था कि क्या सचमुच तू भी (मरणोपरांत पुनर्जीवन को) मानने वालों में से है?
53 क्या जब हम मर गए और हम मिट्टी तथा हड्डियाँ हो गए, तो क्या सचमुच हम अवश्य बदला दिए जाने वाले हैं?
54 वह कहेगा : क्या तुम झाँककर देखने वाले हो?
55 फिर वह झाँकेगा, तो उसे भड़कती हुई आग के बीच में देखेगा।
56 कहेगा : अल्लाह की कसम! निश्चय तू क़रीब था कि मुझे नष्ट ही कर दे।
57 और यदि मेरे पालनहार की अनुकंपा न होती, तो निश्चय मैं भी (जहन्नम में) उपस्थित किए गए लोगों में से होता।
58 तो क्या (यह सही नहीं है) कि हम कभी मरने वाले नहीं हैं?
59 सिवाय अपनी प्रथम मौत के, और न हम कभी यातना दिए जाने वाले हैं।
60 निश्चय यही तो बहुत बड़ी सफलता है।
61 इसी (जैसी सफलता) के लिए कर्म करने वालों को कर्म करना चाहिए।
62 क्या यह आतिथ्य उत्तम है या थोहड़ का वृक्ष?
63 निःसंदेह हमने उसे अत्याचारियों के लिए एक परीक्षा बनाया है।
64 निःसंदेह वह ऐसा वृक्ष है, जो जहन्नम के तल में उगता है।
65 उसके गुच्छे ऐसे हैं मानो वे शैतानों के सिर हों।
66 तो वे (जहन्नमवासी) निश्चय उसमें से खाने वाले हैं। फिर उससे पेट भरने वाले हैं।
67 फिर निःसंदेह उनके लिए उसपर खौलते हुए पानी का मिश्रण है।
68 फिर निःसंदेह उनकी वापसी निश्चय उसी भड़कती हुई आग की ओर होगी।
69 निःसंदेह उन्होंने अपने बाप-दादा को गुमराह पाया।
70 तो वे उन्हीं के पदचिह्नों पर दौड़े चले जा रहे हैं।[11]
71 और निःसंदेह इनसे पहले अगले लोगों में से अधिकतर लोग गुमराह हो चुके हैं।
72 तथा निःसंदेह हमने उनके अंदर कई डराने वाले भेजे।
73 तो देखो कि उन डराए जाने वालों का परिणाम[12] कैसा हुआ?
74 सिवाय अल्लाह के ख़ालिस किए हुए बंदों के।
75 तथा निःसंदेह नूह ने हमें पुकारा, तो निश्चय हम अच्छे स्वीकार करने वाले हैं।
76 और हमने उसे और उसके घर वालों को बहुत बड़ी आपदा से बचा लिया।
77 तथा हमने उसकी संतति ही को बाक़ी रहने वाला[13] बना दिया।
78 और हमने पीछे आने वालों में उसके लिए (अच्छा स्मरण) बाक़ी रखा।
79 सर्व संसार में नूह़ पर सलाम[14] हो।
80 निःसंदेह हम सदाचारियों को इसी तरह बदला देते हैं।
81 निश्चय वह हमारे ईमान वाले बंदों में से था।
82 फिर हमने दूसरों को डुबो दिया।
83 और निःसंदेह उसी के तरीक़े पर चलने वालों में से निश्चय इबराहीम (भी) थे।
84 (उस समय को याद करें) जब वह अपने पालनहार के पास शुद्ध दिल लेकर आए।
85 जब उसने अपने बाप तथा अपनी जाति से कहा : तुम किस चीज़ की इबादत करते हो?
86 क्या अल्लाह को छोड़कर अपने गढ़े हुए पूज्यों को चाहते हो?
87 तो सर्व संसार के पालनहार के विषय में तुम्हारा क्या गुमान है?
88 फिर उसने एक दृष्टि तारों पर डाली।[15]
89 फिर कहा : मैं तो बीमार हूँ।
90 तो वे उससे पीठ फेरकर वापस चले गए।
91 फिर वह चुपके से उनके पूज्यों की ओर गया और कहा : क्या तुम खाते नहीं?
92 तुम्हें क्या हुआ कि तुम बोलते नहीं?
93 फिर वह दाएँ हाथ से मारते हुए उनपर पिल पड़ा।
94 फिर वे दौड़ते हुए उसकी ओर आए।
95 उसने कहा : क्या तुम उसकी इबादत करते हो, जिसे ख़ुद तराशते हो?
96 हालाँकि अल्लाह ही ने तुम्हें पैदा किया तथा उसे भी जो तुम करते हो।
97 उन्होंने कहा : इसके लिए एक इमारत (अग्नि-कुंड) बनाओ, फिर इसे भड़कती आग में फेंक दो।
98 अतः उन्होंने उसके साथ एक चाल चलनी चाही, तो हमने उन्हीं को सबसे नीचा कर दिया।
99 तथा उसने कहा : निःसंदेह मैं अपने पालनहार की ओर[16] जाने वाला हूँ। वह मुझे अवश्य सीधा रास्ता दिखाएगा।
100 ऐ मेरे पालनहार! मुझे एक सदाचारी पुत्र प्रदान कर।
101 तो हमने उसे एक सहनशील पुत्र की शुभ सूचना दी।
102 फिर जब वह उसके साथ दौड़-धूप की आयु को पहुँचा, तो उसने कहा : ऐ मेरे प्रिय बेटे! निःसंदेह मैं स्वप्न में देखता हूँ कि मैं तुझे ज़बह कर रहा हूँ। तो अब देख, तेरा क्या विचार है? उसने कहा : ऐ मेरे पिता! आपको जो आदेश दिया जा रहा है उसे कर डालिए। अगर अल्लाह ने चाहा, तो आप अवश्य मुझे धैर्यवानों में से पाएँगे।
103 अंततः जब दोनों (अल्लाह के आदेश के प्रति) समर्पित हो गए, और उसने उसे पेशानी के एक किनारे पर गिरा दिया।
104 और हमने उसे आवाज़ दी कि ऐ इबराहीम!
105 निश्चय तूने स्वप्न को सच कर दिखाया। हम सदाचारियों को इसी तरह बदला प्रदान करते हैं।
106 निःसंदेह यही तो निश्चय खुला परीक्षण है।
107 और हमने उसके फ़िदया (छुड़ौती) में एक बहुत बड़ा ज़बीहा[17] दिया।
108 और हमने पीछे आने वालों में उसके लिए (अच्छा स्मरण) बाक़ी रखा।
109 सलाम हो इबराहीम पर।
110 हम इसी तरह सदाचारियों को बदला प्रदान करते हैं।
111 निश्चय वह हमारे ईमान वाले बंदों में से था।
112 तथा हमने उसे इसहाक़ की शुभ सूचना दी, जो नबी होगा, सदाचारियों में से (होगा)।[18]
113 तथा हमने उसपर और इसहाक़ पर बरकत उतारी। और उन दोनों की संतति में से कोई सदाचारी है और कोई अपने आप पर खुला अत्याचार करने वाला है।
114 तथा निःसंदेह हमने मूसा और हारून पर उपकार किया।
115 और हमने उन दोनों को और उन दोनों की जाति को बहुत बड़ी विपत्ति से छुटकारा दिया।
116 तथा हमने उनकी सहायता की, तो वही प्रभुत्वशाली रहे।
117 तथा हमने उन दोनों को अत्यंत स्पष्ट पुस्तक (तौरात) प्रदान की।
118 और हमने उन दोनों को सीधे मार्ग पर चलाया।
119 और हमने पीछे आने वालों में उन दोनों का अच्छा स्मरण छोड़ा।
120 सलाम हो मूसा और हारून पर।
121 निःसंदेह हम सदाचारियों को इसी तरह बदला देते हैं।
122 निःसंदेह वे दोनों हमारे ईमान वाले बंदों में से थे।
123 तथा निःसंदेह इलयास निश्चय नबियों में से थे।
124 जब उसने अपनी जाति से कहा : क्या तुम डरते नहीं?
125 क्या तुम 'बअ्ल' (नामक मूर्ति) को पुकारते हो? तथा पैदा करने वालों में सबस बेहतर को छोड़ देते हो?
126 अल्लाह को, जो तुम्हारा पालनहार है तथा तुम्हारे पहले बाप-दादा का पालनहार है।
127 किंतु उन्होंने उसे झुठला दिया। तो निश्चय वे अवश्य हाज़िर किए जाने वाले हैं।
128 सिवाय अल्लाह के ख़ालिस किए हुए बंदों के।
129 और हमने पीछे आने वालों में उसके लिए (अच्छा स्मरण) बाक़ी रखा।
130 सलाम हो इल्यासीन[19] पर।
131 निःसंदेह हम सदाचारियों को इसी तरह बदला देते हैं।
132 निश्चय वह हमारे ईमान वाले बंदों में से था।
133 और निःसंदेह लूत निश्चय रसूलों में से था।
134 जब हमने उसे तथा उसके सब घर वालों को बचाया।
135 सिवाय एक बुढ़िया[20] के, जो पीछे रह जाने वालों में से थी।
136 फिर हमने दूसरों का विनाश कर दिया।
137 तथा निःसंदेह तुम[21] निश्चय सुबह के समय जाते हुए उनपर से गुज़रते हो।
138 तथा रात के समय भी। तो क्या तुम समझते नहीं?
139 तथा निःसंदेह यूनुस निश्चय रसूलों में से था।
140 जब वह भरी नाव की ओर भागकर गया।[22]
141 फिर वह क़ुर'आ में शामिल हुआ, तो हारने वालों में से हो गया।
142 फिर मछली ने उसे निगल लिया, इस हाल में कि वह निंदनीय था।
143 फिर अगर यह बात न होती कि वह अल्लाह की पवित्रता का वर्णन करने वालों में से था।
144 तो निश्चय वह उसके पेट में उस दिन तक रहता, जिसमें लोग उठाए जाएँगे।[23]
145 फिर हमने उसे चटियल मैदान में फेंक दिया, इस हाल में कि वह बीमार[24] था।
146 तथा हमने उसपर एक लता वाला वृक्ष उगा दिया।[25]
147 तथा हमने उसे एक लाख की ओर भेजा, बल्कि वे अधिक होंगे।
148 चुनाँचे वे ईमान ले आए, तो हमने उन्हें एक समय तक लाभ उठाने दिया।[26]
149 तो (ऐ नबी!) आप उनसे पूछें कि क्या आपके पालनहार के लिए बेटियाँ हैं और उनके लिए बेटे?
150 या हमने फ़रिश्तों को मादा पैदा किया, जबकि वे उस समय उपस्थित[27] थे?
151 सुन लो! निःसंदेह वे निश्चय अपने झूठ ही से कहते हैं।
152 कि अल्लाह ने संतान बनाया है। और निःसंदेह वे निश्चय झूठे हैं।
153 क्या उसने पुत्रियों को पुत्रों पर प्राथमिकता दी?
154 तुम्हें क्या हो गया है, तुम कैसा फ़ैसला कर रहे हो?
155 तो क्या तुम शिक्षा ग्रहण नहीं करते?
156 या तुम्हारे पास कोई स्पष्ट प्रमाण है?
157 तो लाओ अपनी किताब, यदि तुम सच्चे हो?
158 और उन्होंने अल्लाह तथा जिन्नों के बीच रिश्तेदारी बना दी। हालाँकि निःसंदेह जिन्न जान चुके हैं कि निःसंदेह वे (मुश्रिक) अवश्य उपस्थित किए जाने वाले हैं।[28]
159 अल्लाह उन बातों से पवित्र है, जो वे वर्णन करते हैं।
160 सिवाय अल्लाह के ख़ालिस किए हुए बंदों के।[29]
161 अतः निःसंदेह तुम तथा जिनकी तुम पूजा करते हो।
162 तुम उसके विरुद्ध (किसी को) बहकाने वाले नहीं।
163 परंतु उसको, जो भड़कती आग में प्रवेश करने वाला है।
164 और हम (फ़रिश्तों) में से जो भी है उसका एक नियत स्थान है।
165 तथा निःसंदेह हम निश्चय पंक्तिबद्ध रहने वाले हैं।
166 तथा निःसंदेह हम निश्चय तस्बीह़ (पवित्रता गान) करने वाले हैं।
167 तथा निःसंदेह वे (मुश्रिक) तो कहा करते थे
168 यदि हमारे पास पहले लोगों की कोई शिक्षा (किताब) होती,
169 तो हम अवश्य अल्लाह के ख़ालिस (चुने हुए) बंदे होते।
170 (फिर जब किताब आ गई) तो उन्होंने उसका इनकार कर दिया। अतः जल्द ही उन्हें पता चल जाएगा।
171 और निःसंदेह हमारे भेजे हुए बंदों के लिए हमारी बात पहले ही निश्चित हो चुकी
172 कि निःसंदेह वही हैं, जिनकी सहायता की जाएगी।
173 तथा निःसंदेह हमारी सेना ही निश्चय प्रभुत्वशाली रहेगी।
174 तो आप कुछ समय तक के लिए उनसे मुँह फेर लें।
175 तथा उन्हें देखते रहें। वे भी शीघ्र ही देख लेंगे।
176 तो क्या वे हमारी यातना की शीघ्र माँग कर रहे हैं?
177 फिर जब वह उनके आँगन में उतरेगी, तो डराए गए लोगों की सुबह बहुत बुरी होगी।
178 َऔर आप कुछ समय तक के लिए उनसे मुँह फेर लें।
179 तथा देखते रहें। जल्द ही वे भी देख लेंगे।
180 पवित्र है आपका पालनहार, पराक्रम व शक्ति का स्वामी!, उस बात से, जो वे बयान करते हैं।
181 तथा सलाम हो रसूलों पर।
182 और हर प्रकार की प्रशंसा अल्लाह के लिए है, जो सर्व संसार का पालनहार है।
टिप्पणियाँ
- 3 [1] ये तीनों गुण फ़रिश्तों के हैं जो आकाशों में अल्लाह की इबादत के लिए पंक्तिबद्ध रहते तथा बादलों को हाँकते और अल्लाह के स्मरण जैसे क़ुरआन तथा नमाज़ पढ़ने और उसकी पवित्रता का गान करने इत्यादि में लगे रहते हैं।
- 10 [2] फिर यदि उससे बचा रह जाए तो आकाश की बात अपने नीचे के शैतानों तक पहुँचाता है और वे उसे काहिनों तथा ज्योतिषियों को बताते हैं। फिर वे उसमें सौ झूठ मिलाकर लोगों को बताते हैं। (सह़ीह़ बुख़ारी : 6213, सह़ीह़ मुस्लिम : 2228)
- 11 [3] अर्थात फ़रिश्तों तथा आकाशों को। [4] अर्थात् उनके पिता आदम (अलैहिस्सलाम) को।
- 24 [5] नरक में झोंकने से पहले।
- 27 [6] अर्थात एक-दूसरे को धिक्कारेंगे।
- 28 [7] इससे अभिप्राय यह है कि धर्म तथा सत्य के नाम से आते थे। अर्थात यह विश्वास दिलाते थे कि यही मिश्रणवाद मूल तथा सत्धर्म है।
- 29 [8] इससे अभिप्राय उन के प्रमुख लोग हैं।
- 30 [9] देखिए : सूरत इबराहीम, आयत : 22
- 49 [10] अर्थात जिस प्रकार पक्षी के पंखों के नीचे छिपे हुए अंडे सुरक्षित होते हैं, वैसे ही वे नारियाँ सुरक्षित, सुंदर रंग और रूप की होंगी।
- 70 [11] इसमें नरक में जाने का जो सबसे बड़ा कारण बताया गया है, वह है नबी को न मानना और अपने पूर्वजों के पंथ पर ही चलते रहना।
- 73 [12] अतः उनके दुष्परिणाम से शिक्षा ग्रहण करना चाहिए।
- 77 [13] उसकी जाति के जलमग्न हो जाने के पश्चात्।
- 79 [14] अर्थात उसकी बुरी चर्चा से सुरक्षा।
- 88 [15] यह सोचते हुए कि इनके उत्सव में न जाने के लिए क्या बहाना करूँ।
- 99 [16] अर्थात ऐसे स्थान की ओर जहाँ अपने पालनहार की इबादत कर सकूँ।
- 107 [17] यह महान ज़बीहा एक मेंढा था। जिसे जिबरील (अलैहिस्सलाम) द्वारा स्वर्ग से भेजा गया। जो आपके प्रिय पुत्र इसमाईल (अलैहिस्सलाम) के स्थान पर ज़बह किया गया। फिर इस विधि को प्रलय तक के लिए अल्लाह के सामीप्य का एक साधन तथा ईदुल अज़हा (बक़रईद) का प्रियवर कर्म बना दिया गया। जिसे संसार के सभी मुसलमान ईदुल अज़हा में करते हैं।
- 112 [18] इस आयत से विदित होता है कि इबराहीम (अलैहिस्सलाम) को इस बलि के पश्चात् दूसरे पुत्र आदरणीय इसहाक़ की शुभ सूचना दी गई। इससे ज्ञात हुआ की बलि इसमाईल (अलैहिस्सलाम) की दी गई थी। और दोनों की आयु में लग-भग चौदह वर्ष का अंतर है।
- 130 [19] इल्यासीन इलयास ही का एक उच्चारण है। उन्हें अन्य धर्म ग्रंथों में इलया भी कहा गया है।
- 135 [20] यह लूत (अलैहिस्सलाम) की काफ़िर पत्नी थी।
- 137 [21] मक्का वासियों को संबोधित किया गया है।
- 140 [22] अल्लाह की अनुमति के बिना अपने नगर से नगर वासियों को यातना के आने की सूचना देकर निकल गए। और नाव पर सवार हो गए। नाव सागर की लहरों में घिर गई। इसलिए बोझ कम करने के लिए नाम निकाला गया, तो यूनुस अलैहिस्सलाम का नाम निकला और उन्हें समुद्र में फेंक दिया गया।
- 144 [23] अर्थात प्रयल के दिन तक। (देखिए : सूरतुल-अंबिया, आयत : 87)
- 145 [24] अर्थात निर्बल नवजात शिशु के समान।
- 146 [25] रक्षा के लिए।
- 148 [26] देखिए : सूरत यूनुस।
- 150 [27] इसमें मक्का के मिश्रणवादियों का खंडन किया जा रहा है, जो फ़रिश्तों को अल्लाह की पुत्रियाँ कहते थे। जबकि वे स्वयं पुत्रियों के जन्म को अप्रिय मानते थे।
- 158 [28] अर्थात यातना के लिए। तो यदि वे उसके संबंधी होते, तो उन्हें यातना क्यों देता?
- 160 [29] वे अल्लाह को ऐसे दुर्गुणों से युक्त नहीं करते।